धुरंधर फिल्म ने कई सारे मिथक तोड़े हैं,,, जिनकी कहीं चर्चा ही नहीं है,,,,
इन दिनों देश दुनिया के मीडिया में बॉलीवुड की हिंदी फिल्म धुरंधर के जबरदस्त चर्चे चल रहे हैं,,, या चलवाए जा रहे हैं,, बेशक यह फिल्म मनोरंजन के लिए एक शानदार मूवी हो सकती है। जबरदस्ती के राष्ट्रवाद को उबालने की कोशिश भी हो सकती है,,, भारतीय खुफिया एजेंसीयों के कारनामों की एक सशक्त दास्तां भी हो सकती है,, रहमान डकैत की कहानियों को मनोरंजन के रूप में दर्शाया जाना भी एक कारीगरी है।
इस फिल्म में सशक्त अदाकारी के मामले में कोई भी किसी से कमतर नहीं रहा है अक्षय खन्ना, रणवीर सिंह, संजय दत्त या अन्य कोई चरित्र अभिनेता सभी ने इस फिल्म में शानदार अदाकारी और शायद अपने जीवन के बेहतरीन को अंजाम दिया है।
इस फिल्म ने पाकिस्तान के प्रति हमारे स्थापित मानदंडों को भी चुनौती दी है
पाकिस्तान में वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई से ज्यादा ताकतवर वहां की पी पी एस सर्विस का एक अधिकारी होता है पी पी एस यानी पाकिस्तान पुलिस सर्विसेज जिस तरह भारत में एक आईपीएस होता हैउसी तरह पाकिस्तान में पीपीएस होता है जो कि पाकिस्तान पुलिस सर्विसेज का पुलिस अधीक्षक केडर का अधिकारी होता है और इस फिल्म में दिखाया गया है कि आई एस आई के सर्वोच्च अधिकारी के रहमान डकैत के पक्ष में होते हुए भी पाकिस्तान पुलिस सर्विसेज का अधिकारी असलम चौधरी रहमान डकैत का एनकाउंटर करने में सफल हो जाता है अपनी जिद के आगे वह आई एस आई के सर्वोच्च अधिकारी की भी नहीं चलने देता यानी की हमारा यह मिथक शायद टूट चुका होगा कि पाकिस्तान में आई एस आई सबसे ताकतवर संस्थान नहीं है।
दूसरा,,, यदि भारतीय एजेंट को किसी को मारना ही था तो सबसे ज्यादा बेहतर शिकार वह षड्यंत्रकारी होने चाहिए थे जिन्होंने 26 /11 के मुंबई हमले करवाए,,, संसद पर हमला करवाया,, अक्षरधाम पर हमला करवाया,,, ऐसे षड्यंत्र कार्यों को मारना ज्यादा बेहतर होता भारतीय एजेंट का बजाय रहमान डकैत को, मारने के क्योंकि रहमान डकैत तो मात्र एक ओजार ,,हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया था क्योंकि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई प्रत्यक्ष रूप से इस काम को अंजाम नहीं दे सकती थी ऐसे में आई एस आई न रहमान डकैत का सहारा लिया जबकि भारतीय एजेंट ल्यारी के सांसद को,, आई एस आई के सरगना को और खाननी ब्रदर्स के साथ नियमित बैठक करता था ऐसे में ज्यादा बेहतर होता कि भारतीय एजेंट इन मुख्य षड्यंत्र कर्ताओं की हत्या करता बजाय रहमान डकैत की हत्या करने के ।,,,,वही कूटनीति के स्तर पर देखा जाए तो रहमान डकैत जो की एक बलूच नेता( गैंगस्टर) था और बलूचियों की ऐतिहासिक रूप से भारतीयों से नजदीकीया जग जाहिर है बलूचिस्तान की आवाम हमेशा से भारतीयों के प्रति नरम रुख अपनाती रही है, वहीं पाकिस्तान के प्रति आज भी अलग बलूचिस्तान की मांग को लेकर संघर्ष निरंतर जारी है ऐसे में रहमान डकैत भारतीय खुफिया एजेंसीयों के लिए एक शानदार और बेहतरीन कैरेक्टर हो सकता
था जिसे भारतीय खुफिया एजेंसियों ने ही न जाने किस कूटनीति के तहत मरवा दिया।
तीसरा,,,, भारतीय खुफिया एजेंसीयों के सरगना सान्याल ने इस फिल्म में तीन बार किसी भारतीय केंद्रीय मंत्री के आई एस आई के सरगनाओ से नजदीकी संबंधों के बारे में जिक्र किया,,, खुफिया लेनदेन के बारे में भी जिक्र किया गया,,,,, यहां तक की हथियारों की सौदागरी के मामले में भी तत्कालीन किसी भारतीय केंद्रीय मंत्री के संलिप्त होने का जिक्र किया परंतु वह इस फिल्म में उस गद्दार तत्कालीन केंद्रीय मंत्री का और उसके पुत्र का खुलासा नहीं कर पाए,, दबी जबान में केवल अपनी आक्रामकता ही दिखाते रह गए ऐसा क्यों किया गया यह फिल्म अंत में सवाल देखने वालों के जहन में छोड़ गई कितने लोगों के जहन में यह सवाल आया इसका कोई आंकड़ा या आकलन नहीं है परंतु सवाल तो लाजमी बनता है।






