*अरे भाई आखिर कहना और करना क्या चाहते हो,,,,,,
समाजों को अपने हक और हकूकों की लड़ाई लड़ने के लिए हजारों वर्षों से प्रत्येक समाज, धर्म, जाति अपने-अपने सामाजिक संगठन बनाते चले आए हैं, और संगठन बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही होता है कि समाज को एक जाजम पर, एक मंच पर लाया जाए और समाज को संगठित रखा जाए ताकि शासको से अपने हक और अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी जा सके और अपनी आवाज बुलंद की जा सके।
अपने समाज के लोगों के जीवन स्तर में सुधार किया जा सके उनके शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहलुओं को विकसित किया जा सके और उन्हें एक श्रेष्ठ नागरिक के रूप में देश और शासको के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके, अपनी एक सुगठित और संगठित ताकत के रूप में जिससे कि शासन वर्ग उस समाज का हमेशा सम्मान करें एवं राष्ट्र की तमाम गतिविधियों में उस समाज को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करें भारत में ऐसे अनेकों छोटे-छोटे जातीय समूहों के संगठन बने हुए हैं जो की बेहद ताकतवर रूप में कार्य कर रहे हैं। और उन समाजों की जनसंख्या बेहद कम होने के बावजूद भी उन संगठनों का रौब , ताकत पूरे देश की तमाम व्यवस्थाओं को प्रभावित करता है।
राजनीतिक सत्ता हासिल करने की पहली पायदान होते हैं यह सामाजिक संगठन,,,
जो समाज जितना संगठित होगा उसकी ताकत राजनीतिक रूप से उतनी ही महत्वपूर्ण होगी चाहे वह संख्या में कितना ही काम या ज्यादा हो,,,, इसे हम वैश्य वर्ग के विभिन्न जातीय समूह और संगठनों का विश्लेषण कर समझ सकते हैं किसी एक जाति विशेष का नाम लेकर विवाद की स्थिति हम नहीं चाहते।
इसी क्रम में आज हम बात करेंगे दक्षिण एशिया में सबसे बड़े जातीय समूह के रूप में पाई जाने वाली भारत की सबसे प्राचीन जाति कोली अथवा कोलिय इस जाति के अनेक वंशों ने दक्षिण एशिया के विभिन्न भू भागों पर अनेक काल खंडों में शासन भी किया है,, परंतु आज यह जाती हजारों टुकड़ों में बट चुकी है दक्षिण एशिया में ईरान अफगानिस्तान की सीमा से वर्तमान पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान,बांग्लादेश, बर्मा,मलेशिया ,इंडोनेशिया, श्रीलंका, हांगकांग, बैंकॉक, मॉरीशस,कोरिया और जापान तक यह जाती बसी हुई थी परंतु आज इस जाति के लोग भूल चुके हैं कि वह कौन थे परंतु धार्मिक रूप से भावनात्मक जुड़ाव भगवान बुद्ध के माध्यम से आज भी कायम है।
इसी समाज की एक संस्था है अखिल भारतीय कोली समाज संस्थान रजिस्टर्ड नई दिल्ली जिसका पंजीयन क्रमांक है 53 56/ 1971- 72 जो कि नई दिल्ली में रजिस्टर्ड है।जिसका पंजीयन कार्यालय कोली समाज भवन बी/1/148 गली नंबर 3, अशोक नगर नई दिल्ली है,, आपको यह जानकर अत्यंत आश्चर्य होगा कि इसी एक पंजीयन क्रमांक पर और पंजीयन कार्यालय के पते पर इसी संस्था के वर्तमान में तीन-तीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हुए हैं और तीनों ही राष्ट्रीय अध्यक्ष इसी पंजीयन क्रमांक का और कार्यालय का उपयोग करते हैं। और यह तीन अध्यक्ष है पूर्व सांसद वीरेंद्र कश्यप जो कि हिमाचल से है वर्तमान में गुजरात सरकार में कैबिनेट मंत्री कुंवर जी भाई बावलिया और तीसरे हैं डॉक्टर एम . एल माहौर जो कि मध्य प्रदेश से है। और यह तीनों ही राष्ट्रीय अध्यक्ष संस्था पर अपने अधिकार का दावा प्रस्तुत करते हैं नई दिल्ली का सहकारिता विभाग जहां यह संस्थाएं पंजीकृत होती है पिछले लगभग 7 वर्षों से इस विवाद का हल नहीं सुलझा पाया, इस विभाग में लंबित उक्त प्रकरण में विभाग ने अभी तक ना तो किसी एक राष्ट्रीय अध्यक्ष को मान्यता दी है और ना ही अन्य राष्ट्रीय अध्यक्षों को पाबंद किया है जो की तथा कथित राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हुए हैं ऐसे में समाज में यही संदेश जा रहा है कि समाज के नेता बनने का स्वांग रचने वाले और समाज को संगठित करने का ऐलान करने वाले लोग खुद ही संगठित नहीं है और अपनी-अपनी डफली अपना अपना राग की तरह अपनी ही धुन में मस्त है समाज की क्या स्थिति है समाज आज किस पायदान पर खड़ा है समाज का बहुसंख्यक वर्ग जो की वर्तमान में असंगठित क्षेत्र का श्रमिक है की भलाई विकास एवं उन्नति के प्रयास कोई सा भी संगठन नहीं कर रहा है। इन संगठनों से जुड़ने का समाज के लोगों का केवल एक ही मकसद होता है कि अपनी-अपने विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियों में कोली समाज से जुड़े होने का पद प्रदर्शित किया जाए और इस रूप में उस राजनीतिक दल से सौदेबाजी की जाए विधानसभा लोकसभा के टिकटों के लिए यह पहले पायदान के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। समाज का बहुसंख्यक वर्ग किस कोने में पड़ा है किस जलालत और जहालत का जीवन जी रहा है , इससे इन तथाकथित संगठनों को कोई लेना-देना नहीं है पूरे देश में केवल एक मात्र कोली समाज ही ऐसा है जो की किसी राज्य में एससी में आता है तो किसी राज्य में केवल एस टी में और किसी राज्य में एससी, एसटी, ओबीसी और जनरल चारों ही वर्गों में इस समाज के लोग गिने जाते हैं और यही कारण है कि यह समाज संगठित नहीं हो पा रहा है।
आगामी जून माह में दो संगठन अखिल भारतीय स्तर का सम्मेलन करने जा रहे हैं जिसमें वही चंद चेहरे जो की पिछले अनेक वर्षों से समाज के संगठन पर कब्जा जमाए बैठे हैं वही चेहरे नजर आते हैं,,, और आएंगे फोटो सेशन होंगे, फेसबुक व्हाट्सएप पर प्रचार होगा,, अपने-अपने राजनीतिक आकाओं को अपनी प्रोफाइल भेजी जाएगी ताकि आगामी चुनाव में टिकटों में स्थान मिल सके समाज के उन्नयन उन्नति और विकास के लिए क्या होगा यह तो महाराज मांधाता ही जाने।
परंतु सबसे गौर तलब बात यह है कि इस प्रकार के तथाकथित सामाजिक संगठनों की बंदर बांट के कारण इस देश की लगभग एक बहुत बड़ी आबादी जो की कोली समाज के रूप में चिन्हित है को गहरा नुकसान हो रहा है, अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाकर लोग सांसदों विधायकों के टिकट तो हासिल कर लेते हैं समाज के नाम पर परंतु समाज को कुछ नहीं मिलता समाज शून्य में ही खड़ा रह जाता है।
सहकारिता विभाग में एक ही पंजीयन क्रमांक और एक ही पंजीयन कार्यालय के नाम पर तीन-तीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहना अपने आप में घोर आश्चर्य की बात है।
ऐसा भी नहीं है कि इस समाज को जितना कमजोर दबा कुचला प्रस्तुत किया जाता है यह समाज उतना दवा कुचला है लेकिन इतना जरूर है कि इस समाज का लगभग 20% हिस्सा बहुत सक्षम , सबल और ताकतवर है गुजरात महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण के राज्यों केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु ,आंध्र, तेलंगाना उड़ीसा जैसे राज्यों में हजारों अरबपति निवास करते हैं इसी समाज के और कहीं ना कहीं शायद यह लड़ाई समाज के संगठन के नाम पर राष्ट्रीय सम्मेलन करने के लिए उगाई जाने वाली धनराशि को लेकर भी हो सकती है। इस संगठन की आर्थिक गतिविधियों को लेकर कभी भी कोई भी लेखा-जोखा सार्वजनिक नहीं किया गया। इस समाज की ताकत यह है कि इस संगठन के माध्यम से इस समाज को संगठित कर किसी एक विचारधारा विशेष की तरफ मोड़ने से आपको इस देश का राष्ट्रपति पद तक भी मिल सकता है।






